सुबह के दस बजे थे जब मेरे दो पक्के दोस्त, पीयूष और केशव, अपनी पत्नियों के साथ मेरे घर होली खेलने पहुँचे। उनके आते ही पूरा घर खिलखिलाहट और उल्लास से भर गया। हवा में गुलाल की महक तैर रही थी और सूरज की किरणें खिड़कियों से झांकती हुई रंगों को और चमकदार बना रही थीं। मैं साकेत, तीस साल का एक जवान आदमी, अपनी पत्नी स्वाति के साथ उनका स्वागत करने दरवाजे पर खड़ा था। पीयूष की पत्नी प्रेमा और केशव की पत्नी कामिनी ने जैसे ही अंदर कदम रखा, उनके चेहरों पर खेलती मुस्कान ने माहौल को और भी रंगीन बना दिया। हम सबने गले मिले, पुराने किस्से याद किए और ठहाकों की गूँज दीवारों से टकराने लगी।
शुरुआत सामान्य रंगों के खेल से हुई। पीयूष ने मेरे गाल पर एक चुटकी गुलाल लगाई, तो केशव ने मेरे बालों में रंग भर दिया। मैंने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए उन दोनों को इतना रंगीन कर दिया कि वे फूलों के गमले जैसे लगने लगे। पत्नियाँ भी पीछे नहीं थीं। स्वाति, प्रेमा और कामिनी आपस में गुलाल उड़ाती, पिचकारियों से रंग भरती और एक-दूसरे को गले लगाती हुई मस्ती में डूबी हुई थीं। उनकी हँसी की आवाज़, रंगों की चमक और खुशबू ने पूरे कमरे को एक जीवंत कैनवस में बदल दिया था।
धीरे-धीरे खेल ने एक नया मोड़ लेना शुरू किया। मेरी नज़र पीयूष और केशव की पत्नियों पर पड़ी। प्रेमा का पीला सूट रंगों से सराबोर हो रहा था, जबकि कामिनी की सफेद कुर्ती पर गुलाल के निशान किसी कलाकार की पेंटिंग जैसे लग रहे थे। एक अजीब सी उत्सुकता मेरे मन में जागी। मैंने सोचा, क्यों न इन दोनों को थोड़ा अलग तरीके से रंगा जाए? मेरे हाथ बिना सोचे-समझे आगे बढ़ गए। पहले मैंने प्रेमा के पास जाकर उसके गालों पर हल्के से गुलाल मल दिया। वह हँसी, उसकी आँखों में एक चमक दौड़ गई। फिर मैं कामिनी के पास गया और उसकी नाक के ऊपर एक हरा टीका लगा दिया। उसने शरारती नज़रों से मेरी ओर देखा, मानो कह रही हो कि अब मेरी बारी है।
खेल और आगे बढ़ा। मैंने थोड़ी हिम्मत जुटाई और प्रेमा के ब्लाउज के अंदर हाथ डालकर उसकी ब्रा पर रंग लगा दिया। वह चौंकी, लेकिन उसके चेहरे पर शर्म की जगह एक रहस्यमय मुस्कान खेलने लगी। कामिनी ने यह देखा तो वह भी पीछे नहीं रही। उसने तुरंत स्वाति के पास जाकर उसकी ब्रा में हाथ डाला और उसे रंगीन कर दिया। स्वाति ने झिझकते हुए भी इस खेल में हिस्सा लिया और पीयूष के पजामे के अंदर हाथ डालकर उसकी जांघ पर रंग लगा दिया। पीयूष की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। उसने स्वाति का हाथ पकड़ा और उसे अपने शरीर के और करीब खींच लिया।
अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी थी। रंगों का खेल शारीरिक आकर्षण के एक नए स्तर पर पहुँच गया था। केशव ने भी इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया। उसने स्वाति के कान में कुछ फुसफुसाया और फिर उसके कपड़ों पर हाथ फेरने लगा। मैं देख रहा था कि कैसे तीनों पत्नियों के चेहरों पर शर्म और उत्सुकता का मिला-जुला भाव था। उनकी आँखें चमक रही थीं, होठों पर मुस्कान थी और शरीर की हरकतों में एक नई जागृति साफ झलक रही थी। मेरा अपना शरीर भी इस उत्तेजना से प्रतिक्रिया दे रहा था। मैं महसूस कर सकता था कि मेरे अंदर एक आग सुलग रही है।
कपड़े अब बाधा बनने लगे थे। पीयूष ने पहल की और अपना कुर्ता उतार फेंका। केशव ने भी उसका अनुसरण किया। मैंने देखा कि प्रेमा और कामिनी की नज़रें उनके शरीरों पर टिकी हुई थीं। स्वाति ने मेरा हाथ थामा और धीरे से कहा, “आज कुछ अलग हो रहा है।” मैंने उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में एक सवाल था, एक इजाजत की प्रतीक्षा। मैंने हामी भरी। उसने मेरी शर्ट के बटन खोलने शुरू किए। एक-एक कर हम सभी के कपड़े कमरे में बिखरने लगे। पहले पुरुषों के, फिर महिलाओं के। हर कपड़े के उतरने के साथ शर्म की परतें भी उतर रही थीं।
जब सभी नंगे हो गए, तो कमरे में एक अलग ही तरह की खामोशी छा गई। प्रेमा का सुडौल शरीर, कामिनी की कोमल त्वचा, स्वाति की नाजुक काया – सब कुछ खुलेआम सामने था। पुरुषों के शरीरों में तनाव साफ झलक रहा था। मैंने देखा कि पीयूष और केशव की नज़रें मेरी पत्नी पर टिकी हुई थीं, जबकि मैं खुद उनकी पत्नियों के शरीरों को निहार रहा था। हवा में यौन उत्तेजना की गंध घुलने लगी थी। कोई बोल नहीं रहा था, लेकिन आँखों की भाषा सब कुछ कह रही थी।
कामिनी ने पहल की। वह अपने पति केशव के पास गई और उसके शरीर को छूने लगी। फिर उसने मुड़कर मेरी ओर देखा, मानो पूछ रही हो कि क्या मैं भी शामिल होना चाहूँगा। मैंने हामी भरी। वह मेरे पास आई और उसने मेरा हाथ थाम लिया। उसकी उँगलियों का स्पर्श मेरे शरीर में बिजली सी दौड़ गई। उधर, स्वाति ने पीयूष के साथ समान व्यवहार किया। प्रेमा अब तक केशव के साथ खेल रही थी। यह एक अजीब सा नृत्य था, जहाँ हर कोई दूसरे की पत्नी के साथ था। शुरुआत में थोड़ी झिझक थी, लेकिन जल्द ही वह भी खत्म हो गई।
मैंने कामिनी को अपने करीब खींचा। उसकी त्वचा गर्म थी, शरीर से गुलाल की हल्की खुशबू आ रही थी। मैंने उसके होठों को चूमा, पहले हल्के से, फिर जोश के साथ। वह जवाब दे रही थी, उसके हाथ मेरी पीठ पर फिर रहे थे। मैंने देखा कि स्वाति पीयूष के साथ ऐसे ही आनंद ले रही थी। एक पल के लिए मेरे मन में ईर्ष्या की भावना उठी, लेकिन फिर मैंने देखा कि प्रेमा केशव के साथ मस्ती में डूबी हुई है। यह एक न्यायसंगत विनिमय लग रहा था। हम सभी वयस्क थे, सहमति से यहाँ थे, और हर कोई आनंद ले रहा था।
कमरे में अब आवाज़ें गूँजने लगीं। हाँफने की आवाज़, मुस्कुराहटें, कभी-कभी हल्की चीखें। मैंने कामिनी को फर्श पर लिटा दिया। उसकी आँखें बंद थीं, होठों पर मुस्कान थी। मैंने धीरे से उसके शरीर पर हाथ फेरा, हर वक्र को महसूस किया। फिर मैंने उसके ऊपर झुककर उससे जुड़ गया। उसकी आँखें खुलीं, उनमें एक तीव्र इच्छा थी। हमारे शरीर एक हो गए। उस पल में सब कुछ भूल गया – शर्म, संकोच, सामाजिक बंधन। केवल वर्तमान था, केवल संवेदनाएँ थीं।
मैंने इधर-उधर देखा। पीयूष स्वाति के साथ सोफे पर था, केशव प्रेमा के साथ कालीन पर। सभी एक ही लय में डूबे हुए थे। कभी आँखें मिलतीं, मुस्कुरातीं, फिर अपने-अपने आनंद में लौट जातीं। यह एक अद्भुत अनुभव था। अपनी पत्नी को किसी और के साथ देखना, और साथ ही किसी और की पत्नी के साथ होना – यह विचित्र था, रोमांचक था, निषिद्ध था, लेकिन अविश्वसनीय रूप से उत्तेजक भी था।
समय बीतता गया। हम सभी थककर चूर हो गए थे। शरीर रंगों और पसीने से लथपथ थे। एक-एक कर हम सभी बाथरूम की ओर चल पड़े। पानी की धारा के नीचे खड़े होकर हम एक-दूसरे के शरीर से रंग धोने लगे। हाथ फिर रहे थे, मुस्कुराहटें बंट रही थीं, लेकिन अब उतनी उत्तेजना नहीं थी। एक शांत संतुष्टि का भाव था। नहाने के बाद हम सभी ने तौलिए लपेटे और लिविंग रूम में लौट आए। कोई शर्म नहीं थी, कोई पछतावा नहीं था। केवल एक अजीब सी आत्मीयता थी जो हम सभी के बीच बन गई थी।
हमने साथ में लंच किया। खाने के दौरान हल्की-फुल्की बातचीत हुई। पीयूष ने कहा, “आज की होली कभी नहीं भूलूँगा।” केशव ने हामी भरी। स्वाति मुस्कुरा रही थी, उसकी आँखों में एक नई चमक थी। प्रेमा और कामिनी भी शांत मुस्कुराहट के साथ बैठी थीं। मैंने सोचा, क्या यह सब सही था? क्या हमने कोई सीमा पार कर ली थी? लेकिन फिर मैंने सबके चेहरों पर देखा – कोई पश्चाताप नहीं, कोई दुख नहीं। केवल संतुष्टि थी। शायद कभी-कभी नियम तोड़ने में भी आनंद होता है।
दोपहर ढलने लगी। दोस्तों ने विदा ली। घर वापस शांत हो गया। स्वाति मेरे पास आकर बैठ गई। उसने मेरा हाथ थामा और कहा, “तुम्हें बुरा तो नहीं लगा?” मैंने उसे गले लगा लिया। “नहीं,” मैंने कहा, “बल्कि मैं तो तुम्हें और खुश देखकर प्रसन्न हूँ।” हम दोनों चुपचाप बैठे रहे, आज के अनुभवों को समेटते हुए। होली का यह दिन हमारी जिंदगी का एक नया अध्याय बन गया था। एक