अनियंत्रित वासना: एक भतीजी का अटूट प्यार और उसका अजीबोगरीब सफर

तीन महीने से अधिक समय बीत चुका था, और उस दौरान श्रेया और उसके चाचा के बीच केवल फोन पर ही बातचीत हो पाई थी। दोनों अलग-अलग शहरों में रहते थे, और हर बार मिलने की कोशिश किसी न किसी वजह से टल जाती थी। श्रेया का दिल हर पल अपने चाचा के लिए तड़पता रहता, उसकी यादों में खोई रहती। वह उन पलों को बार-बार याद करती, जब वह उसके साथ था, और उसकी गर्म सांसें उसकी त्वचा को छू जाती थीं। उसकी वासना दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी, जैसे कोई बेकाबू आग जो शांत होने का नाम ही नहीं ले रही थी। वह रातों को उसकी याद में जागती, और उसके सपनों में वही छाया रहता।

इसी बीच, चाचा के घर में एक नया मोड़ आया। उनके बच्चों की स्कूली छुट्टियां शुरू हो गई थीं, और उनकी पत्नी ने तय किया कि वह बच्चों को लेकर अपने मायके जाएगी। यह खबर चाचा के लिए एक सुनहरे अवसर की तरह थी, क्योंकि इसका मतलब था कि वह कुछ दिनों के लिए पूरी तरह से अकेले रहेंगे। उनके मन में एक उम्मीद की किरण जगी, लेकिन वह जानते थे कि श्रेया से बात किए बिना कुछ भी तय नहीं किया जा सकता। वह उसकी प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगे, यह सोचकर कि कैसे वह इस मौके का फायदा उठा सकते हैं।

अगले दिन, जब चाचा ऑफिस में अपने काम में व्यस्त थे, तभी श्रेया का फोन आया। उसकी आवाज में एक तड़प थी, एक ऐसी चाहत जो शब्दों में बयां नहीं की जा सकती थी। वह बोली, “चाचू! बहुत दिल है! कुछ करो ना!” उसकी आवाज में मिलन की इच्छा साफ झलक रही थी, जैसे वह हर पल उसके पास होने के लिए तरस रही हो। चाचा ने उसे बताया कि उनकी पत्नी मायके जा रही है, और वह उनके घर आ सकती है। यह सुनकर श्रेया की आवाज में एक अजीब सी खुशी घुल गई, मानो उसे वह मौका मिल गया हो जिसका वह सालों से इंतजार कर रही थी।

श्रेया ने जवाब दिया, “चाचू! आपके घर नहीं! चलो कहीं घूमने चलते हैं! मैं ऑफिस से दस दिन की छुट्टी ले लेती हूं!” उसकी आवाज में एक उत्साह था, जैसे वह इस यात्रा को अपने जीवन का सबसे यादगार पल बनाना चाहती हो। चाचा ने मजाक में कहा, “ठीक है! पर तुम्हें दस दिन मेरी पत्नी बनकर रहना होगा! और याद रखना, मैं तुम्हें दिन-रात रगड़ूंगा!” यह सुनकर श्रेया की आवाज और भी मधुर हो गई, और वह बोली, “उफ्फ मेरे जानू! रगड़ डालो ना जितना मर्जी! मैं भी तो यही चाहती हूं!” उसकी बातों में एक गहरा प्यार और समर्पण झलक रहा था, जैसे वह अपना सब कुछ उन पर न्योछावर करने को तैयार हो।

फिर श्रेया ने एक और बात कही जिसने चाचा को हैरान कर दिया। वह बोली, “चाचू! दस दिन ही क्यों? जिंदगी भर के लिए मुझे अपनी पत्नी बना लो ना!” उसकी आवाज में एक गंभीरता थी, जैसे वह सच में अपना सारा जीवन उनके साथ बिताना चाहती हो। चाचा ने संयम से काम लेते हुए कहा, “ठीक है! तुम अपनी चाची को जाने दो, फिर प्लान बनाते हैं!” उन्होंने महसूस किया कि श्रेया की भावनाएं उनकी सोच से कहीं ज्यादा गहरी हैं, और वह इस रिश्ते को एक नई दिशा देना चाहती है।

दो दिन बाद, चाचा की पत्नी बच्चों को लेकर मायके चली गई। घर एकदम शांत हो गया, और चाचा को अपनी अकेली पलों का एहसास हुआ। ऑफिस से लौटने के बाद, वह घर में अकेले बैठे थे, और उनके मन में श्रेया की यादें ताजा हो गईं। उन्होंने उसे फोन किया, लेकिन श्रेया ने बताया कि वह अपने दोस्तों के साथ बाहर है। उसने यह भी कहा कि उसने ऑफिस से एक हफ्ते की छुट्टी ले ली है, लेकिन वह चाचा के घर नहीं आ पाएगी। यह सुनकर चाचा को थोड़ी निराशा हुई, और उन्होंने मजाक में कहा, “क्यों यार! खड़े लण्ड पर चोट कर रही हो! तुम्हारी चाची भी पंद्रह दिन के लिए जा चुकी है, मेरा लण्ड तो तुम्हारी चूत में गोते मारने के सपने देख रहा था!”

तभी फोन के पार से किसी लड़की के हंसने की आवाज आई, और श्रेया ने फुसफुसाते हुए कहा, “चाचू! कुछ तो शर्म करो आप! फोन पे सब कुछ बोले जा रहे हो! मेरा फोन स्पीकर पर था, मेरी सारी फ्रेंड्स ने आपकी बात सुन ली है!” उसकी आवाज में एक शर्मिंदगी थी, लेकिन साथ ही एक मस्ती भी झलक रही थी। फिर वह बोली, “ठीक है चाचू, अब बोलो। मैंने फोन स्पीकर से हटा दिया और साइड में जाकर बात कर रही हूँ।” चाचा ने पूछा, “बता क्या प्लान है?” तो श्रेया ने उत्साह से भरी आवाज में कहा, “चाचू, आप कल यहाँ चंडीगढ़ आ जाओ। फिर हम दोनों यहाँ से हनीमून के लिए धर्मशाला चलेंगे। पूरा एक हफ्ता मैंने आपके डंडे को निचोड़ कर ना रख दिया तो मेरा नाम भी श्रेया नहीं!”

चाचा ने मजाकिया अंदाज में कहा, “साली रण्डी की औलाद! मैं एकदम से कैसे आऊँ?” श्रेया ने जिद्दी अंदाज में जवाब दिया, “चाचू, मुझे कुछ नहीं पता! अगर आप मुझे प्यार करते हो तो आप कल यहाँ पहुँच रहे हो!” चाचा ने उसकी जिद को समझते हुए कहा, “ठीक है, मैं फ्लाइट चेक करता हूँ।” श्रेया खुश होकर बोली, “ओके चाचू! मैं घर जाकर आपको कॉल करती हूँ।” चाचा ने अगले दिन की फ्लाइट बुक कर ली, और रात को दस बजे श्रेया की तरफ से वीडियो कॉल आया। जैसे ही उन्होंने फोन रिसीव किया, श्रेया चहकते हुए बोली, “मेरे प्यारे चाचू! मेरी जान! क्या कर रहे हो?” चाचा ने जवाब दिया, “बस फ्लाइट बुक करके तुम्हारे कॉल का वेट कर रहा था।”

श्रेया ने फोन पर किस करते हुए कहा, “वाउ चाचू! इसका मतलब आप कल आ रहे हो!” चाचा ने पुष्टि की, “बिल्कुल आ रहा हूँ!” श्रेया सोफे से उठकर खड़ी होते हुए बोली, “सच्ची चाचू! मैं बहुत खुश हूँ! आपके लिए मेरे पास सरप्राइज है! बस आप जल्दी से आ जाओ!” फिर वह बोली, “बस मैं भी अभी आई हूँ।” चाचा ने श्रेया से थोड़ी देर और बात की, और फिर जाने की तैयारी में जुट गए। अगले दिन सुबह दस बजे की फ्लाइट से वह चंडीगढ़ के लिए रवाना हो गए।

एयरपोर्ट पर पहुँचते ही, चाचा ने श्रेया को देखा। वह एक लाल टॉप पहने हुई थी, जिसमें उसके मोटे कबूतर झकड़े हुए थे। शायद उसने अंदर ब्रा नहीं पहनी थी, क्योंकि उसके निप्पल्स टॉप से झाँक रहे थे। उसका पूरा पेट नंगा था, और उसकी पतली कमर पर एक छोटी सी स्कर्ट बंधी हुई थी। अगर वह थोड़ा सा झुक जाती, तो उसके चूतड़ पूरे दिख जाते। स्कर्ट इतनी पतली थी कि अंदर से उसकी टाँगें झाँक रही थीं। श्रेया ने लाल लिपस्टिक लगा रखी थी, और माथे पर काला चश्मा पहना हुआ था। पाँच फुट नौ इंच लंबी, दूध जैसी गोरी त्वचा वाली श्रेया ने हाई हील की चप्पलें पहन रखी थीं, जिससे वह और भी लंबी दिख रही थी।

चाचा को देखकर श्रेया दौड़कर उनके पास आई और उनसे लिपट गई। चाचा ने भी उसकी कमर में अपनी बाहें लपेट दीं, और श्रेया ने अपनी टाँगें मोड़कर हवा में लहरा दीं। फिर उसने चाचा के होंठों को चूमा, और उनकी आँखों में देखते हुए बोली, “फाइनली मेरी जान आ ही गई! आह! आई लव यू चाचू! सच्ची, मैं इन दिनों में आपको मिस करके बहुत रोई हूँ!” चाचा ने मौके का फायदा उठाते हुए, श्रेया की स्कर्ट में पीछे से हाथ डालकर उसके चिकने चूतड़ों की गोलाई का जायजा लिया, और कहा, “मेरी जान! मिस तो मैंने भी तुम्हें बहुत किया!”

इस हरकत से श्रेया मुस्कुराकर अलग हो गई, लेकिन चाचा ने देखा कि वह थोड़ी असहज महसूस कर रही थी। शायद ऐसे पब्लिक में उसे अपने चूतड़ों पर हाथ फिरवाना अच्छा नहीं लगा। तभी चाचा ने देखा कि श्रेया की बगल में एक और लड़की खड़ी थी, जो उन्हें देखकर मुस्कुरा रही थी। श्रेया ने उसकी तरफ देखकर कहा, “चाचू! ये मेरी बेस्ट फ्रेंड अवनी है, मेरे साथ ही रहती है!” अवनी ने हाथ बढ़ाते हुए हेलो कहा, और श्रेया की तरफ देखकर शरमाते हुए बोली, “चाचू बोलूँ या जीजू? कुछ समझ नहीं आ रहा!” श्रेया तपाक से बोली, “मेरे कुछ भी हो, मैं जिससे प्यार करती हूँ वो तुम्हारे तो जीजू ही हुए ना!” अवनी मुस्कुराकर चाचा की तरफ देखकर बोली, “जी जीजू!”

चाचा ने उसे अपनी तरफ खींचते हुए कहा, “अरे! जीजू के गले लगकर मिलते हैं! ऐसे क्या बेगानों की तरह दूर से ही हेलो?” अवनी झूलते हुए चाचा की बाहों में आ गई, और लिपटते हुए बोली, “जीजू! श्रेया सच ही बोलती थी, बड़े

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