बस की यात्रा और एक अप्रत्याशित मुलाकात
एक दिन जयपुर से अपने गाँव लौटते समय मैंने एक स्थानीय बस में सवारी की। बस में भीड़ इतनी थी कि खड़े होने के लिए भी जगह तंग थी। मैंने अपने कंधे पर लटके बैग को समेटते हुए खुद को संतुलित किया। बस की खिड़कियों से आती तेज धूप और शरीरों के सटने की गर्मी … Read more