टूटे दिल का सहारा: एक भाभी के साथ अधूरे प्यार से निकलकर नए रिश्ते की कहानी

मेरी दुनिया उस दिन टूट गई जब शालिनी ने मेरे हाथ छोड़ दिए। छह महीने की शादी, जिसे मैंने अपने सारे सपनों से सजाया था, उसके पिता की जिद के आगे धराशायी हो गई। अलीगढ़ की उन गलियों में, जहाँ हमारी पहली मुलाकात हुई थी, अब सिर्फ खालीपन और यादों का साया रह गया था। मैं रुद्र, जो कभी हर चेहरे पर मुस्कान बिखेरता था, अब अपने कमरे की चारदीवारी में कैद एक उदास शख्स बन गया। रातें लंबी होती चली गईं, दिन बेमानी लगने लगे, और दिल में बस एक ही सवाल गूँजता रहा – इतना प्यार क्यों नहीं टिक पाया?

डिप्रेशन की उस गहरी खाई में जब मैं धीरे-धीरे डूब रहा था, तभी फेसबुक पर एक नया सिलसिला शुरू हुआ। शालिनी की चचेरी बहन ने संपर्क किया। जब उसने मेरी पूरी कहानी सुनी, तो उसकी आँखों में न्याय के लिए आग जल उठी। उसने महसूस किया कि मेरे साथ कितनी बड़ी नाइंसाफी हुई है। एक दिन उसने अपनी पड़ोसन सैंडी को यह बात बताई, जिसका पति सेना में था और वह अक्सर अकेली रहती थी। शायद उसने सोचा होगा कि एक नया संवाद, एक नया रिश्ता मेरे जख्मों पर मरहम लगा सकता है।

सैंडी से पहली बार बात हुई तो उसकी आवाज़ में एक अजीब सी शांति और समझदारी थी। वह बस सुनती रही – मेरे टूटे सपनों की कहानी, अधूरे प्यार की पीड़ा, और अकेलेपन की वो स्याह रातें। उसने सिर्फ सुना ही नहीं, महसूस किया। धीरे-धीरे, उन फोन कॉल्स ने मेरी उदासी के बादलों में एक रोशनी की किरण सी छोड़नी शुरू कर दी। आठ घंटे की नौकरी के बाद का समय अब उन बातों के इंतज़ार में गुजरने लगा। हम हर चीज़ पर बात करते – फिल्मों से लेकर फिलॉसफी तक, मज़ाक से लेकर गहरी बातों तक। एक ही वाक्य के दो मतलब निकालकर हंस पड़ना हमारा नया शगुन बन गया।

समय बीतता गया और एक दिन हमने मिलने का प्लान बनाया। दिवाली की छुट्टियाँ थीं और मैं घर जा रहा था। सबसे पहले मैं सैंडी से मिलने पहुँचा। जब वह सामने आई, तो मेरी सांसें थम सी गईं। काले रंग की साड़ी में लिपटी वह शख्सियत सिर्फ खूबसूरत ही नहीं, एक अलग ही आत्मविश्वास से भरी हुई थी। उसकी मुस्कान में एक मासूमियत थी और आँखों में एक गहराई, जो बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाती थी। पीटर इंग्लैंड मॉल में हमारी शॉपिंग सिर्फ खरीददारी नहीं, एक दूसरे को समझने की कोशिश बन गई। मंदिर की शांति में हमारी चुप्पी भी एक तरह की बातचीत ही थी।

विदा होने का समय आया तो मेरे मन में एक खालीपन सा छा गया। मैंने हिम्मत जुटाकर कहा, “मुझे आपके साथ थोड़ा और वक्त बिताना है… आपके हाथ का बना खाना खाने का मन है।” उसने इनकार कर दिया, उसके चेहरे पर एक संकोच सा दिखा। मैंने काफी अनुरोध किया, लेकिन वह नहीं मानी। जब मैं वहाँ से चल पड़ा, तो रास्ते में ही उसका फोन आया। “कहाँ हो?” उसकी आवाज़ में एक अजीब सी बेचैनी थी। मैंने बताया कि घर जा रहा हूँ। वह गुस्से में बोली, “आप खुद ही रुक सकते थे न!” उस पल मैं समझ गया कि उसका इनकार सिर्फ एक दिखावा था। मैंने कहा, “अभी बोलो तो वापस आ जाऊँ।” एक पल की खामोशी के बाद उसने कहा, “ठीक है… लेकिन थोड़ी देर से आना, जब सब सो जाएँ।”

रात के नौ बजे थे। मैं बस स्टैंड पर दो घंटे इंतज़ार कर चुका था। आखिरकार उसका फोन आया और उसने रास्ता बताया। उसके घर पहुँचकर जब दरवाज़ा खोला, तो सैंडी एक साधारण मैक्सी में थी, लेकिन उसकी सादगी में भी एक आकर्षण था जो मन को मोह ले। मन तो कर रहा था कि उसे गले से लगा लूँ, लेकिन ऊपर उसके ससुराल वाले रहते थे और उसके दो छोटे बच्चे भी वहीं सो रहे थे। हम चुपचाप कमरे में दाखिल हुए। कमरे में हल्की रोशनी थी और बच्चों की निश्चिंत नींद की आवाज़ें। सैंडी ने कहा, “टेंशन मत लो, ये गहरी नींद में सोते हैं। सुबह तक नहीं जागेंगे।”

वह चाय लेकर आई – नमकीन, बिस्किट और मिठाई के साथ। चाय की गर्माहट और कमरे की खामोशी में हमारी बातें फिर से शुरू हुईं। मैं उसे देखता रहा – उसके चेहरे के हल्के नूर को, उसकी आँखों की चमक को। वह शर्मा गई, “ऐसे मत देखो।” मैंने कहा, “आप इतनी खूबसूरत हो कि देखे बिना रहा नहीं जाता।” वह हंस पड़ी, “बस करो यार, इतनी तारीफ़।” खाना खाते वक्त हमने एक दूसरे को खिलाया। उस पल ऐसा लगा जैसे दुनिया की सारी दूरियाँ खत्म हो गई हों। मन में एक ख्याल आया – काश यही मेरी ज़िंदगी होती।

बातें करते-करते हम लेट गए। बिस्तर अलग-अलग थे। मैंने कहा, “इतनी दूर क्यों? पास आओ ना।” वह हिचकिचाई, “नहीं… ऐसे ही ठीक है।” मेरी जिद के आगे वह टिक न सकी और धीरे से मेरे पास आकर लेट गई, “बस… कुछ नहीं करना।” मैंने वादा किया। पहले तो सब कुछ सामान्य था। फिर मेरा हाथ उसकी जाँघ पर पड़ा। एक अजीब सी कोमलता, एक मुलायमियत जिसे शब्दों में बयान कर पाना मुश्किल था। उसका शरीर सुडौल था, एक संतुलित खूबसूरती से भरा हुआ। धीरे-धीरे हमारी सांसें तेज होने लगीं। चुंबन ने वह दूरी मिटा दी जो हमारे बीच थी। उसकी आँखें बंद थीं, चेहरे पर एक अजीब सी तड़प थी। जब मैंने आगे बढ़ना चाहा, तो वह दर्द से कराह उठी, “धीरे… बहुत दर्द हो रहा है।” पहला पल बहुत जल्दी बीत गया। शायद दोनों ही बहुत दिनों से इस इंतज़ार में थे।

दूसरी बार जब हम नज़दीक आए, तो कोई हिचक नहीं थी। हम पूरी तरह एक दूसरे के साथ थे। मेरे हाथ उसके शरीर पर घूम रहे थे – कभी कमर पर, कभी कंधों पर। हर छूआई एक नया एहसास था। चुंबन गहरे होते गए, सांसें तेज। जब वह बेकाबू होने लगी, तो मैंने फिर से उसके शरीर से जुड़ गया। इस बार जोश था, उत्साह था। वह चीख उठी, फिर धीरे-धीरे हमारी गति एक ताल में बंध गई। पंद्रह मिनट बाद जब चरम सीमा नज़दीक आई, तो उसने मुझे कसकर गले लगा लिया। उसके कंधे पर मेरे दांतों के निशान थे और मेरे कंधे पर उसके। झरने के बाद भी मैं उसके ऊपर ही लेटा रहा, दोनों की धड़कनें एक साथ धड़क रही थीं। उस रात हम पाँच बार मिले। हर बार एक नया अनुभव, एक नया एहसास।

लेकिन यह कहानी का अंत नहीं था। कुछ दिनों बाद मुझे पता चला कि सैंडी का एक पुराना बॉयफ्रेंड है, जिससे उसका झगड़ा हुआ था। एक दिन मैंने उसे उसी लड़के से बात करते सुना। मेरा दिल टूट गया। जब मैंने नाराजगी जताई, तो वह रोने लगी, “मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती। बात करना बंद मत करो।” मैंने उस वक्त माफ कर दिया। लेकिन जब दोबारा वही हुआ, तो मैंने उससे सब संपर्क तोड़ लिया। दिल फिर टूटा था, लेकिन इस बार नए जख्मों के साथ। फिर मैंने उसकी छोटी बहन से दोस्ती की। वह कहानी अगली बार। यह थी मेरी ज़िंदगी का वो अध्याय, जहाँ एक भाभी ने मेरे टूटे दिल को सहारा दिया, लेकिन खुद ही उसे दोबारा चोटिल कर दिया।

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