मेरा नाम अंकित है और मैं बारहवीं कक्षा का छात्र हूँ। हमारा परिवार एक छोटे से गाँव में रहता है, जहाँ रिश्तों की गर्माहट और सामुदायिक जीवन की सरलता हर पल महसूस होती है। एक दिन मेरी माँ अपनी बहन की बेटी, मेरी मौसेरी बहन राधा को हमारे घर ले आईं। राधा दीदी अभी-अभी विधवा हुई थीं, कोरोना काल में उनके पति की अचानक मृत्यु हो गई थी। उनका चेहरा शोक से धुँधला था, आँखों में एक गहरा दर्द समाया हुआ था, जैसे कोई फूल मुरझा गया हो। माँ ने कहा कि वह कुछ दिन हमारे साथ रहेंगी, ताकि उनका दुःख कुछ हल्का हो सके। मैंने उन्हें पहली बार इतने करीब से देखा था। उनका शरीर युवावस्था की पूरी रसीली भरपूरी लिए हुए था, जैसे कोई पका हुआ आम, जिसकी मिठास चखने का मन करे। उनकी आँखों में एक ऐसी उदासी थी जो शब्दों से परे थी, और उनके होंठ हमेशा थोड़े से दबे रहते, जैसे वे कुछ कहना चाहते हों पर शब्द न मिलते हों।
राधा दीदी का शरीर एक ऐसी युवती का था जिसने अभी-अभी जीवन के पूर्ण रस का स्वाद चखा था। उनके स्तन भरे हुए थे, जैसे दो पके हुए फल, जो उनके कपड़ों के नीचे से अपनी उपस्थिति का अहसास कराते रहते। उनकी कमर पतली थी और नितंब गोल और उभरे हुए, जैसे किसी मूर्तिकार ने उन्हें पूरी सावधानी से गढ़ा हो। मैं अक्सर उन्हें देखता रहता, और मेरे मन में एक अजीब सी उत्तेजना जाग उठती। एक दिन वह नहा रही थीं और उन्होंने मुझे आवाज़ दी, “अंकित, एक बाल्टी पानी और ला दो ना।” मैं पानी लेकर बाथरूम के बाहर पहुँचा। गाँव के बाथरूम के ऊपर सिर्फ एक पुराना कपड़ा लटका हुआ था, जो पर्दे का काम करता था। मैंने आवाज़ लगाई, “दीदी, पानी रख दूँ?” उनकी आवाज़ अंदर से आई, “बाहर ही रख दो।” मैं बाल्टी रखने ही वाला था कि अचानक मेरी नज़र कपड़े के एक छोटे से छेद से अंदर पड़ गई।
वहाँ राधा दीदी खड़ी थीं, अपने शरीर पर साबुन लगा रही थीं। पानी की धार उनके कंधों से होती हुई नीचे बह रही थी, और उनकी त्वचा चमक रही थी। फिर मैंने देखा, वह अपने जघन क्षेत्र को धीरे से साफ कर रही थीं। उनकी योनि थोड़ी फैली हुई और गुलाबी थी, जैसे कोई नाजुक फूल खिला हो। उस दृश्य ने मेरे शरीर में एक तीव्र कंपन पैदा कर दिया। मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा और मेरे हाथ पसीने से तर हो गए। मैं वहाँ से हटना चाहता था, पर मेरे पैर जैसे जम गए थे। तभी उन्हें शायद मेरी परछाई का आभास हुआ, और उन्होंने एक खाँसी जैसी आवाज़ निकाली। मैं तुरंत वहाँ से भाग आया, मेरे कानों में अपने दिल की धड़कनें गूँज रही थीं। पूरा दिन वह दृश्य मेरी आँखों के सामने घूमता रहा, और मेरे मन में एक अजीब सी बेचैनी बनी रही।
रात होते ही घर में शांति छा गई। खाना खाने के बाद सब सोने के लिए तैयार होने लगे। तभी मेरी माँ ने कहा, “आज अंकित तुम अपनी दीदी के साथ सो जाना। बाकी कमरे में जगह नहीं है।” मेरा दिल एक बार फिर तेज़ी से धड़कने लगा। राधा दीदी ने कोई आपत्ति नहीं की, बस मुस्कुरा दीं। हमारे कमरे में एक छोटी सी खाट थी, जिस पर दो लोगों के लिए जगह बमुश्किल थी। मैं धीरे से उनके पास लेट गया। कमरे में हल्की सी ठंडक थी, और हवा में नहाने के बाद के साबुन की खुशबू तैर रही थी। दीदी ने एक साधारण सूती साड़ी पहनी थी, और उनके बाल अभी भी थोड़े गीले थे। हमने कुछ देर बातें कीं, फिर वह बोलीं, “चलो, सो जाते हैं।” उन्होंने दीया बुझा दिया, और कमरा अँधेरे में डूब गया।
खाट इतनी छोटी थी कि हमारे शरीर लगभग एक दूसरे से सटे हुए थे। मैं सीधा लेटा रहा, पर मेरी जाँघ कभी-कभी उनके पैरों से टकरा जाती। उनके शरीर की गर्माहट मुझ तक पहुँच रही थी, और मेरे मन में एक अजीब सी घबराहट हो रही थी। थोड़ी देर बाद दीदी ने करवट बदली, और अब उनकी पीठ मेरी तरफ हो गई। उनके नितंब मेरी जाँघ के पास आ गए, और मैं अनजाने में ही उनकी तरफ थोड़ा और सट गया। अब उनका गद्देदार नितंब सीधे मेरी जाँघ से लग रहा था। मेरे शरीर में एक गर्मी दौड़ गई, और मैंने महसूस किया कि मेरा लिंग सख्त हो रहा है। मैंने कोशिश की कि अपने विचारों को नियंत्रित करूँ, पर वह दृश्य फिर से मेरी आँखों के सामने आ गया। मैं धीरे-धीरे अपने कूल्हे हिलाने लगा, ताकि मेरा लिंग उनके नितंबों से हल्का सा स्पर्श करे। कंबल ऊपर था और अँधेरा गहरा, इसलिए कोई देख नहीं सकता था।
तभी दीदी ने फिर से हल्का सा हिलना शुरू किया। मेरी साँसें रुक सी गईं, और मैं तुरंत पीछे हट गया। क्या उन्हें कुछ पता चल गया? पर कुछ देर तक कोई आवाज़ नहीं आई। मैं फिर से साहस जुटाकर अपने कूल्हे हिलाने लगा। इस बार मैंने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और उनकी साड़ी के पल्लू को थोड़ा ऊपर सरकाया। मेरी उँगलियाँ उनकी जाँघ पर पड़ीं, और मैंने महसूस किया कि उनकी त्वचा मुलायम और गर्म है। मैं धीरे-धीरे अपना हाथ ऊपर ले जाने लगा, और जब कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, तो मैंने उनकी योनि को छू लिया। वह गर्म और थोड़ी गीली थी। मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था। मैंने एक उँगली धीरे से अंदर डाली, और वह और भी गर्म और नम महसूस हुई। अब मुझे यकीन हो गया कि दीदी जाग रही हैं, पर वह चुप हैं।
मैंने अपना लिंग निकाला और धीरे से उनकी योनि के द्वार पर रखा। फिर मैंने धीरे से दबाव डाला, और वह अंदर चला गया। एक गर्म, नम और तंग अहसास ने मुझे घेर लिया। दीदी ने हल्का सा हिलना शुरू किया, पर इस बार मैंने रुकने की कोशिश नहीं की। मैं धीरे-धीरे आगे-पीछे होने लगा। उन्होंने भी अपने नितंबों को मेरी तरफ थोड़ा और दबाया, जैसे वह मेरी गति के साथ तालमेल बिठा रही हों। उनकी साँसें थोड़ी तेज़ हो गईं, पर वह अभी भी चुप थीं। मेरी जाँघें उनके नितंबों से टकरा रही थीं, और हर टकराव के साथ मेरे शरीर में एक नई लहर दौड़ जाती। मैंने अपनी गति बढ़ा दी, और कुछ ही पलों में मुझे लगा कि मैं सह नहीं पाऊँगा। मैंने तुरंत अपना लिंग बाहर निकाला और अपना वीर्य उनकी जाँघों पर छोड़ दिया। दीदी ने कोई आवाज़ नहीं निकाली। मैंने उनकी साड़ी के पल्लू से वीर्य पोंछ दिया और वापस लेट गया।
कुछ देर बाद दीदी ने अपना हाथ पीछे किया और मेरे लिंग को पकड़ लिया। वह फिर से सख्त हो रहा था। इस बार वह पलटी और मेरे होंठों को अपने होंठों से छुआ। मैंने भी उनके होंठों को चूमना शुरू कर दिया। उनके होंठ नरम और मीठे थे, जैसे कोई पका हुआ फल। फिर मैंने उनके स्तन को अपने हाथ में लिया, वह भरा हुआ और लचीला था। दीदी ने मेरे मुँह में अपना निप्पल दिया, और मैंने उसे चूसना शुरू कर दिया। वह धीरे-धीरे मेरे ऊपर चढ़ गईं, और मैंने फिर से उनकी योनि में प्रवेश किया। इस बार हमारी गति तेज़ थी, और हम दोनों एक दूसरे के साथ तालमेल बिठा रहे थे। करीब बीस मिनट तक हम इसी तरह जुड़े रहे, और फिर मैंने फिर से बाहर निकलकर वीर्य छोड़ दिया। उस रात हम तीन बार एक दूसरे के साथ रहे, और हर बार एक नया आनंद मिला। सुबह होते ही दीदी चुपचाप उठ गईं, और मैं भी बाथरूम की ओर चला गया। पूरे दिन हमने एक दूसरे से कोई बात नहीं की, पर हमारी नज़रें कभी-कभी मिल जातीं, और उनमें एक गहरा रहस्य छिपा होता।
कुछ दिन बाद एक और मौका मिला, जब पूरा परिवार एक शादी में चला गया। दीदी ने जाने से मना कर दिया, और माँ ने मुझे उनके साथ घर पर रुकने को कहा। जैसे ही सब चले गए, मैंने दरवाज़ा बंद किया और सीधे दीदी के पास पहुँच गया। इस बार कोई डर नहीं था, कोई संकोच नहीं था। मैंने उन्हें गले से लगा लिया और उनके होंठों को चूमना शुरू कर दिया। वह भी उत्सुक थीं, और उन्होंने जवाब दिया। हमने घंटों एक दूसरे को चूमा, छुआ और अन्वेषण किया। मैंने उनके पूरे शरीर को चाटा, उनके स्तनों को चूसा, और फिर नीचे जाकर उनकी योनि को चाटना शुरू कर दिया। वह मीठी और नम थी, और उनकी साँसें तेज़ हो गईं। फिर उन्होंने मेरा लिंग अपने मुँह में ले लिया, और मैंने उनकी योनि में प्रवेश किया। उस दिन हमने दिनभर एक दूसरे के साथ समय बिताया, और हर पल एक नया आनंद दिया। उन दिनों की यादें आज भी मेरे